दोस्त की साली मुझे बहा ले गई 2

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मेरी यह कहानी मेरी पिछली कहानी
दोस्त की साली मुझे बहा ले गई
को आगे बढ़ाती है.

मेरी पिछली कहानी में मैंने दुल्हन की बहन का नाम नहीं लिखा था, मैं उन्हें पियू नाम से बुलाता हूँ तो यहाँ पर उनके लिए यही नाम प्रयोग करूँगा.
तो चलिए कहानी को आगे बढ़ाते हैं.

हमारी बातें अब तक सिर्फ़ फोन से ही होती थी, मिलना तो मुमकिन नहीं था पर एक दूसरे को आमने सामने आना भी नसीब नहीं होता, बस कभी फोन और वीडियो कॉल हो जाती थी. वो अपनी जिन्दगी में व्यस्त और मैं अपने जीवन में… इसी तरह दिन गुजर रहे थे.

ठंड शुरू होने के पहले की बात है, मेरे दोस्त के परिवार ने बाहर घूमने का प्लान बनाया जिसमें जीजा जी, अंकल, दोस्त के साले और पियू का परिवार सब मिलाकर 25 लोग शामिल थे. इस पूरे प्लान में मैं कहीं नहीं था क्योंकि इनका प्लान दीवाली के बाद जाने का था और दीवाली के वक़्त मेरा बिज़नेस जोर पर होता है तो मैं नहीं जाने वाला था.

योजना कुछ ऐसे बनी कि पहले सब यहाँ से ट्रेन से पुणे तक जाएँगे, फिर वहाँ से बस करके महाबलेश्वर और बाकी जगह घूमेंगे जिसके लिए टिकेट्स और बस का अरेंजमेंट मुझे और मेरे दोस्त को मिलकर करना था.
मैंने और दोस्त ने मिल कर ट्रेन की टिकेट्स तो कर ली पर बस का इंतजाम यहाँ से करना सम्भव नहीं हो रहा था तो मैंने मेरे पूना के दोस्त से मदद ली और एक अच्छी 32 सीटर बस बुक कर दी.

सब कुछ सही जा रहा था, सारी तैयारी पूरी हो गयी थी कि जाने के कुछ दिन पहले पता चला कि मेरे दोस्त के कजिन की बैंक की परीक्षा उसी वक़्त है और उसे अटेंड करना ज़रूरी है तो उसका जाने का प्रोग्राम रद्द हो गया. और जाने एक दिन पहले मुझे चलने के लिए उन्होंने मना लिया. अब मेरे मन में इस बात की खुशी थी कि मुझे पियू का साथ मिलेगा.

हम सब रेलवे स्टेशन पर मिले, मैंने सबका अभिवादन किया और पियू को भी हेलो कहा. वो मुझे स्टेशन पर सामान के साथ देखकर चौंक गयी. वक़्त पे प्लान बदल गया है और दोस्त के कज़िन की जगह मैं आ रहा हूँ, यह हमने किसी को नहीं बताया था.

ट्रेन में सबका सामान रख देने के बाद सब अपनी अपनी सीट पे बैठ गये. हमारी कुछ सीट्स साथ में थी तो कुछेक साथ वाली बोगी में! रात भर का सफ़र था तो खाने का समान लेकर निकले थे. चार पाँच परिवार साथ में थे तो सब अपने अपने घर से लेकर आए थे. रात में खाना खाने सब एक ही जगह जमा हो गये और एक दूसरे की बनाई हुई चीजें टेस्ट कर रहे थे.
तो पियू ने भी मुझे उसका बनाया हुआ खाना टेस्ट कराया, सब लोग साथ में होने की वजह से मै पियू से ज़्यादा बात नहीं कर रहा था.

थोड़ी देर गप्पें लड़ाने के बाद सबको नींद आने लगी तो सब जाकर सो गये.

सवेरे 10 बजे हम पुणे पहुँचे. वहाँ स्टेशन पर ही हमारे लिए बस खड़ी थी, सबने अपना सामान उस बस में रख दिया और अपने हिसाब से सीट पकड़ ली. मैंने अपने लिए सबसे पीछे खिड़की वाली सीट पकड़ ली. मेरे आसपास काफी सारी सीट खाली थी.

पुणे से महाबलेश्वर करीब 130 किमी दूर है, कोई 3 से 3.30 घंटे का रास्ता है. पुणे छोड़ते ही सारे जेंट्स बस के पिछले हिस्से में आ गये और अपना ड्रिंक का प्रोग्राम शुरू कर दिया. सब मस्त एंजाय कर रहे थे.

रास्ते में हम सड़क किनारे वाले एक ढाबे पर खाना खाने रुके. वहाँ सब गाड़ी से नीचे उतर गये, बस कुछ लोग बस में ही आराम कर रहे थे. कुछ जिन्हें रास्ते में उल्टी हुई और कुछ जेंट्स जिनको ड्रिंक्स ज़्यादा हो गयी, वो लोग बस में आराम कर रहे थे.
तो हमने सोचा कि इनको थोड़ी देर यही रहने दो और बाकी लोग फ्रेश होकर खाने का ऑर्डर दे दो. जब खाना लग रहा होगा, तब सबको बुला लेंगे.

सबने अपनी अपनी पसंद का खाना ऑर्डर किया. गाड़ी में जो लोग बचे थे, मैं उनको उनकी पसंद पूछने गया. सारे लोग बोले- हम आ रहे हैं.
पर पियू बोली कि वो कुछ नहीं खाएगी, उसे उल्टी होने से अच्छा नहीं लग रहा, वो थोड़ी देर और आराम करेगी.

तो मैंने उसको बोला- आपको बस से परेशानी है और आप इसी में आराम कर रही हो? थोड़ा नीचे उतरो, फ्रेश हो जाओ, आपको अच्छा लगेगा.
जब तक मैं उससे बात कर रहा था तब तक बाकी लोग बस से उतर के ढाबे के तरफ बढ़ चुके थे. ड्राइवर भी उन्ही के साथ खाने के लिए अंदर चला गया था. गाड़ी में सिर्फ़ मैं और पियू थे.

पियू मेरी बात मान गयी और उठ कर चलने के लिए तैयार हो गयी. उसने देखा कि गाड़ी में हमारे अलावा कोई नहीं है तो उसने मुझे एक ज़ोर का हग किया और बोली- तुम्हें सबकी कितनी फिकर है.
और मुझे गाल पे किस किया.
मैंने उसको अपने से अलग करते हुए कहा- यहाँ कोई भी कभी भी आ जाएगा. वैसे भी बाकी लोग अंदर पहुँच गये हैं, सिर्फ़ अपन दोनों ही यहाँ हैं. वहाँ तेरा पति ग़लत ना सोच ले!
मैंने उससे कहा कि थोड़ा सब्र कर ले.

और हम भी ढाबे के अंदर चले गये. वहाँ सबने फ्रेश होकर खाना खाया और वहाँ से निकल गये. खाना खाने के बाद नींद आ रही थी और दो घंटे का रास्ता अभी भी बाकी था. आधे लोग नींद की डुलकियाँ लेने लगे और मैं अपनी जगह पर बैठ कर रास्तों का मज़ा ले रहा था.

पियू को अब थोड़ा अच्छा लग रहा था, वो बस में बैठने के बाद से ही आराम कर रही थी तो वो उठके मेरी आगे वाली सीट पे विंडो के साइड बैठ गयी. अब मैं उसको पीछे से छेड़ रहा था सीट के ऊपर से कभी उसके बाल खींच देता. उसे गुस्सा तो आ रहा होगा पर वो बस में कुछ नहीं कह सकती थी.
इस तरह हम महाबलेश्वर पहुँच गये.

महाबलेश्वर पहुँच कर हम बुक किए हुए रिज़ॉर्ट में पहुँचे. बहुत ही प्यारा रिज़ॉर्ट था आगे में गार्डेन और स्वीमिंग पूल था और पीछे में पहाड़ी.
हमारे लिए जो रूम रिज़र्व थे, वो एक लाइन से थे. रूम का कलर और डेकोरेशन भी मस्त था. रूम में दो दरवाजे थे, एक जो पहाड़ियों की तरफ खुलता था और एक दरवाजा गार्डन की तरफ!

सारे कपल को उनका अपना अलग कमरा मिला हुआ था और मुझे और बच्चों को एक कमरा! हमने सबसे आखिर वाला कमरा चुना था ताकी बच्चे अगर अकेले कहीं निकल जायें तो किसी ना किसी की नज़र उनपे पड़े!
पियू ने भी मेरे पास वाला ही कमरा सेलेक्ट किया. उसके बाद मेरे दोस्त का और फिर बाकी सब जीजाजी और बड़े लोगों का!
सब लोग अपना अपना सामान लेकर कमरे में शिफ्ट हो गये.

आज हमारा कहीं घूमने का प्लान नहीं था, ट्रेन और बस की यात्रा से सब थके हुए थे और किसी का कहीं और जाने का मूड नहीं था. ये हमें पता था तो हम सब मस्त आराम से तैयार हुए और गार्डन साइड पे आकर आराम से बैठ गये. वहाँ का मौसम बहुत सुहाना होता है.

शाम होते ही सर्द हवाओं ने अपना रंग दिखना शुरू कर दिया, सबको ठंड लगने लगी, मैंने दोस्त से मज़ाक में कहा- यार इस मौसम में यहाँ गार्डन में बैठ के मस्त पेग मारने का मूड हो रहा है. मेरा दोस्त भी तैयार हो गया और यह बात उसने जीजाजी को बताई और बाकी सब भी दारू पार्टी के लिए तैयार हो गये. हमने रिज़ॉर्ट मैनेजर से बात की और गार्डेन में ही ड्रिंक्स का मज़ा लेने लगे.

रात में खाना ख़ाकर हम बैठे थे पर पियू के पति (रमेश, काल्पनिक नाम) खाना खाने के बाद भी ड्रिंक कर रहे थे. सबने उनको रोका पर वो बोले कि उनका रोज का काम है, कुछ नहीं होगा.

धीरे धीरे सब अपने अपने कमरे की तरफ निकल लिए. बच्चे तो पहले ही सो चुके थे.
अब बाहर सिर्फ़ तीन लोग बचे थे, मैं, मेरा दोस्त और रमेश … उसने बोतल की बची हुई ड्रिंक भी ख़त्म की. पर तब तक वो भी डाउन हो चुका था, मैंने और मेरे दोस्त ने सहारा देकर उसे कमरे तक छोड़ा और हम अपने अपने कमरे में चले गये.
मेरे कमरे में सारे बच्चे सो गये थे.

थोड़ी देर कमरे में बैठा टीवी देख रहा था तो सिगरेट पीने की तलब हुई, मुझे ड्रिंक के साथ स्मोक करने की आदत है पर मैं परिवार वालों के सामने स्मोक नहीं करता. पर जब भी बाहर जाता हूँ अपने साथ सिगरेट का पैकेट ज़रूर रखता हूँ.

तो रात को मैं पीछे वाला दरवाजा खोल के बाहर निकला और सिगरेट जला कर पीने लगा. दो तीन कश मारे होंगे कि मेरे बाजू वाले कमरे से पियू भी बाहर आ गयी, उसने मुझे स्मोक करते हुए देख लिया और मेरे पास आकर धीरे आवाज़ में मुझे डाँटने लगी कि मैं स्मोक क्यों करता हूँ, ड्रिंक करता हूँ उतना काफ़ी नहीं क्या!

मैंने उसे बता दिया कि ड्रिंक के साथ स्मोक की आदत है और बहुत कम स्मोक करता हूँ.
उसने मुझे आगे से स्मोक करने के लिए मना किया.

मैंने उससे पूछा कि वो क्यों बाहर आ गयी?
तो वो बोली- मैंने तुमको बताया था ना कि रमेश का ड्रिंक पे कोई कंट्रोल नहीं है, आज भी कहाँ है किसके साथ है इसका कोई ध्यान ही नहीं, सारे लोग एक लिमिट में ड्रिंक करके उठ गये… पर ये है कि कंट्रोल नहीं करते. अगर इनको कुछ बोलूँ तो अभी यही तमाशा हो जाएगा. और अभी आके सो गये.

बातें करते हुए वो उदास हो गयी थी और उसकी आँखें भी भर आई थी. मैंने उसको रोने से मना किया और उसको बोला- मैं हूँ ना!
और वो मेरे सीने से लिपट गयी.

हम दोनों मेरे कमरे के साइड में छोटी सी गली थी, वहाँ चले गये. मैं अब उसको किस कर रहा था और वो भी मेरा साथ दे रही थी. मुझसे ज़्यादा आग तो उधर लगी थी, सांस लेने तक नहीं दिया. हम लगातार दस बारह मिनट तक लिप किस करते रहे. मैं किस करते हुए उसके बूब्स और पूरे शरीर को अपने हाथों से मसल रहा था, उसकी लेगिंग के अंदर हाथ डाल कर उसकी चूत को मसल रहा था.

तभी मैंने उसको अपने से थोड़ा दूर किया और बोला- ज़ोर की पेशाब लगी है, मैं कर के आता हूँ.
वो बोली- उसके लिए कमरे में जाने की क्या ज़रूरत है, यहीं कर लो, कौन देख रहा है.
मैंने कहा- बच्चों को एक बार देखकर आता हूँ. और तब तक तुम भी देख लो कि कहीं रमेश जाग ना गया हो.
वो ‘ठीक है…’ बोली और हम दोनों अपने अपने कमरे में चले गये.

मैं टॉयलेट जाकर आया और एक नज़र सारे बच्चों पर से घुमाई, सब के सब घोड़े बेच कर सो रहे थे. फिर मैं सामने वाले दरवाजे से बाहर निकला और एक राउंड मार कर वापस आ गया. पूरे गलियारे में सन्नाटा पसरा हुआ था, किसी के कमरे से आवाज़ नहीं आ रही थी.

मैं पीछे वाले दरवाजे से बाहर निकल कर पियू की प्रतीक्षा करने लगा. पियू को आने के लिए टाइम लगा तो मैंने पूछ लिया- क्या कर रही थी इतना देर तक? कहीं पति जाग तो नहीं गया था?
तो वो बोली- वो एक बार पीकर लुढ़क गये तो अब सवेरे ही उठेंगे. मैं फ्रेश हो रही थी इसलिए वक़्त लग गया.

हम फिर से एक दूसरे को किस कर रहे थे, मेरा हाथ जब उसके उरोजों को मसलने लगे तो मैंने पाया इस बार उसने अपनी ब्रा नहीं पहनी है. तो मैंने नीचे हाथ लगाया तो उसने चड्डी भी नहीं पहनी थी. अब मुझे समझ में आया कि इसीलिए उसको आने में वक़्त लग गया था, वो पूरी चुदाई के मूड में थी.

और भी उस रात मैंने खड़े खड़े ही उसकी चुदाई की. कभी घोड़ी स्टाइल में तो कभी डोगी स्टाइल में! और दीवार से सटा कर भी!
हमने एक डेढ़ घंटे तक चुदाई का खेल खेला और फिर वापस कमरे में जाके सो गये. पूरे टूर में मुझे और दो बार पियू के साथ चुदाई का खेल खेलने मिला. एक बार जब सब घूमकर आने बाद शाम को सबको पूल में उतर कर मस्ती कर रहे थे तो पियू सर दर्द का बहाना करके कमरे में सोई थी और मैं भी ठंड का बहाना कर के कमरे में चला गया था. फिर पीछे के दरवाजे से पियू के कमरे में जाकर उसकी चुदाई की थी.
और दूसरी बार महाबलेश्वर की आखिरी रात को हमने फिर से ड्रिंक पार्टी की और रमेश ज़्यादा पीकर लुढ़क गया था, तब हमने फिर से चुदाई का खेल खेला.

मेरे अचानक बने इस टूर ने पियू और मेरा फिर से मिलन करवा दिया.
पियू से मेरी बात फोन पर होती रहती है, पर अब कब मिलना होगा किसको पता.

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